
गैस त्रासदी के चार दशक बाद भी अपराधी आज़ाद, पीड़ितों के घाव हरे
भोपाल / नई दिल्ली। भोपाल गैस त्रासदी को चार दशक बीत चुके हैं, लेकिन इस सबसे भयावह औद्योगिक दुर्घटना के पीड़ितों को आज भी न्याय का इंतज़ार है। यह घटना सिर्फ एक त्रासदी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा विश्वासघात था जहाँ राजनीतिक मिलीभगत ने हज़ारों जानें लेने वाली जहरीली गैस से भी अधिक घातक भूमिका निभाई।
एंडर्सन की रहस्यमय रिहाई:
जब हज़ारों पीड़ित साँस लेने के लिए संघर्ष कर रहे थे, उस समय तत्कालीन कांग्रेस-नेतृत्व वाली सरकार ने यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वॉरेन एंडरसन को चुपचाप देश से बाहर निकालने में मदद की। पीड़ितों के जीवन और सच्चाई की कीमत पर, राजनीतिक लाभ के लिए एंडरसन की यह रिहाई देश के इतिहास में एक काला अध्याय बन गई।
जवाबदेही पर चुप्पी:
आज चार दशक बाद भी, त्रासदी के मुख्य दोषी सज़ा से बचे हुए हैं और पीड़ितों के घाव अभी भी हरे हैं।
इस घटना ने भारतीय न्यायिक और राजनीतिक प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। भारत को इस त्रासदी के संबंध में जवाबदेही (Accountability) चाहिए, विस्मृति (Amnesia) नहीं।
> संपादकीय टिप्पणी: “यह देखना दुखद है कि कैसे राजीव गांधी सरकार ने एंडरसन को भागने में मदद की, जिससे न्याय की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही बाधित हो गई। इस त्रासदी की सच्चाई और इसके पीछे के राजनीतिक फैसलों पर देश की नज़र बनी रहनी चाहिए।”
यह घटना हमें याद दिलाती है कि जब तक पीड़ितों को पूरा मुआवज़ा और अपराधियों को सज़ा नहीं मिलती, तब तक न्याय की लड़ाई जारी रहेगी।
